:::…सपने भी थक चुके है …:::

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:::…सपने भी थक चुके है …:::

काश,
प्यार करने के भी
पैसे मिलते   ….
तो कोई ना हटाता नज़र
उनके नयन से   …

और अचानक!!!  …
ठपक – टपाक
जमीं पे घिसता हुआ मेरा जूता  …
सपनों से
हकीकत में खींचता है हमें  …
और हम आपकी नजरो से
दूर हो जाते है  …
इस घिसती हुई जुते जैसी जिंदगी को
संवार ने के लिए  …

क्योंकि  …
अब तो सारे सपनें ही …
जैसे सच्चाई कि राह पे  …
थक चुके है  …  

जयेन्द्र आशरा  … २०१४.०१.०९…

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2 thoughts on “:::…सपने भी थक चुके है …:::

  1. मै और स्वप्न एक दूजे को खोजने निकले
    स्वप्न के इंतजार मै जागता रहा,..और..
    स्वप्न मुंजे छोड़ कर खुद की सृष्टि में बस गया ..
    हिम्मत भाई

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